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आजादी के आन्दोलन में संघ की ऐसी थी भूमिका, आप भी जानिए

एक षड्यंत्र के तहत यह प्रचारित किया जाता है कि आज़ादी के आंदोलन में संघ का कोई योगदान नही है, जबकि इतिहास गवाह है कि डॉ हेडगेवार सहित अनेक स्वयंसेवको ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए जेल की यातनाएं सही थी
    जरा पूछिये स्वतंत्रता संग्राम में संघ के योगदान पर सवाल उठाने वालों से क्या वो लाल, बाल, पाल जैसी त्रिमूर्ति का कोई योगदान स्वतंत्रता आंदोलन में मानते है? हमें हमेशा आधा इतिहास क्यों बताया जाता है? हमें हमेशा ऐसा मानने के लिए बाध्य क्यों किया जाता रहा है? कि आज़ादी की लड़ाई सिर्फ कांग्रेस ने ही लड़ी, आज़ादी सिर्फ 1942 के सत्याग्रह से ही मिली, हाँ गांधी जी ने सत्याग्रह के माध्यम से, चरखा और खादी के माध्यम से सर्व सामान्य जनता को स्वतंत्रता आंदोलन में आह भागी होने का एक सरल एवं सहज तरीका, साधन उपलब्ध कराया।

और लाखों की संख्या में लोग स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ सके, यह बात सच है, परंतु सारा श्रेय एक ही आंदोलन या पार्टी को देना यह इतिहास से खिलवाड़ है अन्य सभी के प्रयासों का अपमान है, अगर आज़ादी सिर्फ चरखा चलाने या खादी कातने से मिली है तो खुदीराम बोस, राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह, लाला लाजपत राय से लेकर सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों की भूमिका को लेकर भी उनकी वही राय है? जो संघ को लेकर है, अगर नहीं तो यह दोहरा मापदंड क्यों?

जैसा की हम जानते हैं, गांधी जी के नेतृत्व में तीन बार सत्याग्रह हुए 1921, 1930, 1942 संघ संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार ने संघ स्थापना से पहले 1921 और बाद में 1930 वाले सत्याग्रह में भाग लिया था और उन्हें कारावास भी सहना पड़ा था, जबकि 1940 में उनका स्वर्गवास हो गया था

अब संघ की बात करनी है तो डॉक्टर हेडगेवार से ही करनी पड़ेगी। डॉक्टर हेडगेवार का जन्म 1889  का है नागपुर में स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा 1904-1905 से शुरू हुई। उसके पहले अंग्रेजो के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन का बहुत वातावरण नहीं था फिर भी 1897 में रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के हीरक महोत्सव के निमित्त स्कूल में बांटी गई मिठाई 8 साल की केशव ने ना खाकर कूड़े में फेंक दिया, यह था उसका अंग्रेजों के गुलाम होने का गुस्सा और चीड़, 1907 में रिस्ले सेक्युलर नाम से वंदे मातरम के सावर्जनिक उदघोष पर पाबंदी का जो अन्याय पूर्ण आदेश घोषित हुआ था, उसके विरोध में केशव ने अपने नील सिटी विद्यालय में सरकारी निरीक्षक के सामने अपनी कक्षा के सभी विद्यार्थियों द्वारा वंदे मातरम उदघोष करवाकर विद्यालय के प्रशासन का रोष और उसकी सजा के नाते विद्यालय से निष्कासन भी मोल लिया था। डॉक्टरी पढ़ने के लिए मुंबई में सुविधा होने के बावजूद क्रांतिकारियों का केंद्र होने के नाते उन्होंने कोलकाता को पसंद किया। वहां वे क्रांतिकारियों की शीर्ष संस्था अनुशीलन समिति के विश्वासपात्र सदस्य बने थे

1916 में डॉक्टर बनकर वे नागपुर वापस आए। डॉक्टरी एवं विवाह नहीं करने का निर्णय लिया उनके मन में स्वतंत्रता प्राप्ति की इतनी तीव्रता और अर्जेंसी थी कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन का कोई विचार नहीं करते हुए अपनी सारी शक्ति समय और क्षमता राष्ट्र को अर्पित करते हुए स्वतंत्रता के लिए चलने वाले हर प्रकार के आंदोलन से अपने आप को जोड़ दिया

लोकमान्य तिलक पर उनकी अनन्य श्रद्धा थी तिलक के नेतृत्व में नागपुर में होने जा रहे 1920 के कांग्रेस अधिवेशन की सारी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी डॉक्टर हर्डिकर और डॉक्टर हेडगेवार को दी गई थी उसके लिए उन्हें 1200 स्वयंसेवको की भर्ती करवाई थी उस समय डॉक्टर हेडगेवार कांग्रेस की नागपुर शहर इकाई के संयुक्त सचिव थे अधिवेशन में पारित करने हेतु कांग्रेस की प्रस्ताव समिति के सामने डॉक्टर हेडगेवार ने ऐसा प्रस्ताव का सुझाव रखा था कि कांग्रेस का उद्देश्य भारत को पूर्ण स्वतंत्र कर भारतीय गणतंत्र की स्थापना करना और विश्व को पूंजीवाद के चंगुल से मुक्त करना होना चाहिए संपूर्ण स्वतंत्र स्वतंत्रता का सुझाव कांग्रेस ने वर्ष 1931 में लाहौर अधिवेशन में स्वीकृत किया इस से आनंदित होकर डॉक्टर जी ने संघ की सभी शाखाओं में 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस का अभिनंदन करने की सूचना दी थी नागपुर तिलकवादियों का गढ़ था 1 अगस्त 1920 को लोकमान्य तिलक के देहावसान के कारण नागपुर के सभी तिलकवादियों में निराशा छा गई बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का स्वतंत्रता आंदोलन चला।

असहयोग आंदोलन के समय 1921 में साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में सामाजिक आधार को व्यापक करने की दृष्टि से, अंग्रेजों द्वारा तुर्किस्तान में खिलाफत को निरस्त करने से आहत मुस्लिम मन को अंग्रेजो के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ने के उद्देश्य से महात्मा गांधी ने खिलाफत का समर्थन किया। इस पर कांग्रेस के अनेक नेता तथा राष्ट्रवादी मुस्लिमों को आपत्ति थी इसलिए तिलकवादियों का गढ़ होने के कारण नागपुर में असहयोग आंदोलन बहुत प्रभावी नहीं रहा परंतु डॉक्टर हेडगेवार, डॉक्टर चोलकर, समिमुल्ला खान आदि ने यह परिवेश बदल दिया उन्होंने खिलाफत को राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने पर आपत्ति होते हुए भी उसे सार्वजनिक नहीं किया इसी मापदंड के आधार पर साम्राज्यवाद का विरोध करने के लिए उन्होंने तन मन धन से आंदोलन में सहभाग लिया व्यक्तिगत सामाजिक संबंधों से अलग हटकर उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रीय परिस्थिति का विश्लेषण किया और आसपास के राजनीतिक वातावरण एवं दबंग तिलकवादियों के दृष्टिकोण की चिंता नहीं कि उन पर चले राजद्रोह के मुकदमे में उन्हें 1 वर्ष का कारावास सहना पड़ा वह 19 अगस्त 1921 से, 11 जुलाई 1922 तक कारावास में रहे, वहां से छूटने के बाद 12 जुलाई को उनके सम्मान में नागपुर में एक सावर्जनिक सभा का आयोजन हुआ था समारोह में प्रांतीय नेताओं के साथ साथ कांग्रेस के अन्य राष्ट्रीय नेता हकीम अजमल खान, पंडित मोतीलाल नेहरू, राजगोपालाचारी, डॉक्टर अंसारी, विट्ठल भाई पटेल आदि डॉक्टर हेडगेवार का स्वागत करने के लिए उपस्थित थे

1930 में गांधी के आवाहन पर सविनय अवज्ञा आंदोलन 6 अप्रैल को गुजरात के दांडी नामक स्थान से नमक सत्याग्रह के नाम से शुरू हुआ, 1931 में ही इस संग चालकों की तीन दिवसीय बैठक में इस आंदोलन को बिना शर्त समर्थन करने का निर्णय संघ में हुआ था, इस सत्याग्रह में उनके साथ प्रारंभ में 21 जुलाई को 3 से 4000 लोग थे वर्धा यवतमाल होकर पुसद पहुंचते-पहुंचते सत्याग्रह स्थल पर 10000 लोग इकट्ठे हुए इस सत्याग्रह में उन्हें 9 महीने का कारावास हुआ वहां से छूटने के पश्चात सरसंघचालक का दायित्व पुनः स्वीकार कर वह फिर से संघ कार्य में जुट गए

8 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवलिया टैंक मैदान पर कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधीजी ने "अंग्रेजो भारत छोड़ो" यह ऐतिहासिक घोषणा की, दूसरे दिन से ही देश में आंदोलन ने गति पकड़ी और जगह-जगह आंदोलन के नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हुई

विदर्भ में बावली (अमरावती) आष्टी (वर्धा) और चिमुर (चंद्रपुर) में विशेष आंदोलन हुए, चिमुर के समाचार बर्लिन रेडियो पर भी प्रसारित हुए, यहां के आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेस के उद्धवराव कोरेकर और संघ के अधिकारी दादा नाइक, बाबू राव बेगड़े, अण्णाजी सिरास ने किया, इस आंदोलन में अंग्रेजों की गोली से एक मात्र मृत्यु बालाजी रायपुरकर इस संघ स्वयंसेवक की हुई, कांग्रेस श्री तुकड़ों महाराज द्वारा स्थापित श्री गुरुदेव सेवा मंडल एवं संघ स्वयंसेवकों से मिलकर 1943 का चिमूर का आंदोलन और सत्याग्रह किया इस संघर्ष में 125 सत्याग्रहियों पर मुकदमा चला और असंख्य स्वयंसेवकों को कारावास में रखा गया

अंग्रेजों के दमन के साथ-साथ एक तरफ सत्याग्रह चल रहा था तो दूसरी तरफ अनेक आंदोलनकर्ता भूमिगत रहकर आंदोलन को गति और दिशा देने का कार्य कर रहे थे ऐसे समय भूमिगत कार्यकर्ताओं को अपने घर में पनाह देना किसी खतरे से खाली नहीं था 1942 में आंदोलन के समय भूमिगत आंदोलनकर्ता अरुणा आसफ अली दिल्ली के प्रांत संघचालक लाला हंसराज गुप्त के घर रही थी और महाराष्ट्र में सतारा के उग्र आंदोलन करता नाना पाटिल को भूमिगत स्थिति में औंध के संघचालक पंडित सातवलेकर ने अपने घर में आश्रय दिया था ऐसे असंख्य नाम और हो सकते हैं उसमें इन सारी बातों का दस्तावेजीकरण करने की कल्पना भी संभव नहीं थी

भारत को केवल राजनीतिक इकाई मानने वाला एक वर्ग हर प्रकार के श्रेय को अपने ही पल्ले में डालने पर उतारू दिखता है स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए दूसरों ने कुछ नहीं किया, सारा का सारा श्रेय हमारा ही है ऐसा एकतरफा प्रचार करने पर वह आमदा दिखता है, यह उचित नहीं है सशस्त्र क्रांति से लेकर अहिंसक सत्याग्रही सेना में विद्रोह आजाद की हिंद फौज इन सभी प्रयासों का एकत्र परिणाम स्वतंत्रता प्राप्ति में हुआ है, इस में द्वितीय विश्व युद्ध में जीतने के बाद भी इंग्लैंड की खराब हालत और अपने सभी उपनिवेशों पर शासन करने की असमर्थता और अनिच्छा के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता, स्वतंत्रता के लिए भारत के समान दीर्घ संघर्ष नहीं हुआ ऐसे उपनिवेशों को भी अंग्रेजों ने क्रमशः स्वतंत्र किया है

1942 का सत्याग्रह महात्मा गांधी द्वारा किया हुआ आखिरी सत्याग्रह था, और उसके पश्चात 1947 में देश स्वतंत्र हुआ यह बात सत्य है, परंतु इसलिए स्वतंत्रता केवल 1942 के आंदोलन के कारण मिली और जो लोग उस आंदोलन में कारावास में रहे उनके ही प्रयासों से भारत स्वतंत्र हुआ यह कहना हास्यपद, अनुचित और असत्य है, क्या ऐसा कहकर प्रचार पाने वाले लोग सिर्फ संघ के ही साथ नहीं झांसी की रानी, तात्या टोपे, मंगल पांडे, खुदीराम बोस, बाल गंगाधर तिलक, लाल लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, शहीद भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, ऊधम सिंह, करतार सिंह सराभा, राजगुरु, सुखदेव, सुभाष चंद्र बोस जैसे अनेको अनेक क्रांतिकारियों के साथ अन्याय नहीं कर रहे?

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About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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