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#Notebandi के पहले किसान को मार गया था लकवा, मौत के बाद मिले एक लाख 46 हजार

बैतूल/भोपाल, ब्यूरो। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में नोटबंदी का असर अब भी देखने को मिल रहा है। दरअसल, 8 नवंबर  2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐलान के बाद  500 और 1000 रुपए की मुद्रा का अवैध घोषित हो गई है। इससे जहां एक तरफ पूरा देश प्रभावित हुआ। वहीं, इस नोटबंदी की मार अब भी बैतूल जिले के एक किसान के परिवार को भुगतना पड़ रहा है। हुआ यूं कि सितंबर माह में तिवरखेड़ निवासी किसान रामजी पिता तुकाराम लकवा गस्त हो गया। जिससे उनका पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। इसके बाद फरवरी 2017 में उनकी मौत हो गई।

इसके बाद तेरहवीं के भोज के लिए जब उनके पुत्र पुरुषोत्तम कुंभारे ने गेहंू निकालने के लिए कोठी खोली और गेहूं निकाला तो उसमें 1 लाख 46 हजार रुपए के पुराने 1000 और 500 के नोट निकले। लेकिन, तब तक नवंबर में नोटबंदी होकर फरवरी तक नोट बदलने का भी समय निकल चुका था। पुरुषोत्तम द्वारा इसका पंचनामा तिवरखेड़ पंचायत से भी बनाया गया तथा नोट बदलने नागपुर जाकर सीधे आरबीआई से संपर्क किया, लेकिन आरबीआई ने दो टूक जवाब देते हुए कह दिया कि अब पुराने नोट नहीं बदले जा सकते।

कलेक्टर शशांक मिश्र ने भी खड़े किए हाथ
इसके बाद परेशान पुरुषोत्तम एवं उसके परिवार ने हर जगह गुहार लगाई, लेकिन कहीं भी नोट नहीं बदले। अंत में उसने एक बार फिर मंगलवार बैतूल में जनसुनवाई के दौरान कलेक्टर शशांक मिश्र से गुहार लगाई लेकिन वहॉ भी उन्हे निराशा ही हाथ लगी तथा कलेक्टर ने भी कह दिया कि अब वे भी कुछ नहीं कर सकते। परेशान किसान का परिवार अब सकते में है कि पैसा होने के बावजूद वह इसका उपयोग नहीं कर सकता।

दस्तावेज भी बताए लेकिन, कुछ नहीं हुआ
पुराने नोट नहीं बदलने का पूरे परिवार पर व्यापक असर देखने को मिला है। मृतक किसान की तेरहवीं के खर्च से जहां पूरा परिवार कर्जदार बन गया है। यदि नोट बदल जाते तो कर्ज अदा हो जाता। पुरुषोत्तम कुंभारे ने बताया कि उसकी बहन मोनिका इंदौर में कक्षा 12वीं में अध्ययनरत है फिलहाल पैसा नहीं होने के कारण अब उसकी पढ़ाई प्रभावित हो गई है। पुरूषोत्तम ने बताया कि कलेक्टर से गुहार लगाने के बाद भी निराशा हाथ लगी है इसलिए अब वे सारी उम्मीद छोड़ चुके हैं। उन्होंने बताया कि नोट नहीं बदलवाने के कारण से लेकर समस्त दस्तावेज भी बताए गए लेकिन इसके बावजूद कुछ नहीं हो पाया है।


About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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